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उत्तराखंड के इस गाँव मे हनुमान जी की पूजा नहीं होती , लाल झंडा भी नहीं लगाते लोग

त्तराखंड के चामोली जिले में जोशीमठ से करीब 50 किलोमीटर की  दूरी पर स्थित नीति गांव के समीप 14000 हजार फुट की ऊंचाई पर बसा है,  द्रोणागिरी गांव । यहाँ के द्रोणगिरी पर्वत की चर्चा रामायण काल से ही प्रसिद्ध है। इस दुर्गम गांव में सभी भगवान की पूजा होती है, लेकिन यहाँ बजरंगबली नहीं पूजे जाते । 

नवीन भंडारी                                  

द्रोणगिरी पर्वत का इतिहास रामायण काल से जुड़ा है। लंका के राजा रावण द्वारा छल से माता सीता के  हरण के पश्चात राम-रावण का युद्ध चल रहा था। इस युद्ध में रावण के पुत्र मेघनाद द्वारा चलाए गए शक्ति बाण से लक्ष्मण मुर्छित हो गए थे। तब वैद्य ने लक्ष्मण के प्राण बचाने के लिए   द्रोणगिरी पर्वत से संजीवनी बूटी लाने की सलाह दी । रामभक्त हनुमान इसके लिये तैयार हुए ,लेकिन जब द्रोणगिरी पहुंचे तो संजीवनी बूटी नहीं पहचान पाए , तब उन्होंने रात में ही पर्वत का बड़ा हिस्सा ही उखाड़ लिया । बस यहीं से द्रोण गिरी के लोगों के लिए हनुमान जी त्याज्य हो गए।द्रोणागिरी के लोग आजतक हनुमानजी को उनके इस गलती के लिए माफ नहीं कर पाए हैं। दरअसल हनुमान जी मुर्छित लक्ष्मण के उपचार के लिए जिस पहाड़ को उठा ले गए थे यहां के लोग उस पहाड़ की पूजा किया करते थे. इस गांव में हनुमान जी की नाराजगी का यह आलम है कि इस गांव में हनुमानजी का प्रतीक लाल झंडा भी लगाने की मनाही है।

यहां प्रचलित कथा के अनुसार  हनुमान जी जब संजीवनी बूटी खोजते हुए इस गांव में पहुंचे तो वे चारों तरफ पहाड़ देखकर भ्रम में पड़ गए. उन्होंने गांव के एक वृद्ध महिला से संजीवनी बूटी का पता पूछा. वृद्धा ने एक पहाड़ की तरफ इशारा किया. हनुमान जी इस पहाड़ पर पहुंचे लेकिन यहां पहुंचकर भी वे तय नहीं कर पाए कि संजीवनी बूटी कौन सी है.असमंजस की स्थिति में बजरंगबली पूरा का पूरा पहाड़ ही उठाकर उड़ चले. दूर लंका में मेघनाद के शक्ति बाण का चोट खाकर लक्ष्मण मुर्छित पड़े थे. राम विलाप कर रहे थे और पूरी वानर सेना मायूस थी. जब हनुमान पहाड़ उठाए रणभूमि में पहुंचे तो सारी वानर सेना में उत्साह की लहर दौड़ पड़ी. पूरी वानर सेना में हनुमानजी की जयजयकार होने लगी. सुषेण वैद्य ने तुरंत औषधियों से भरे उस पहाड़ से संजीवनी बूटी को चुनकर लक्ष्मण का इलाज किया जिसके बाद लक्ष्मण को होश आ गया।

यहां तक कि गावं के निवासी लाल झंडा तक नहीं लगा सकते। उनका कहना है कि जिस वक्त हनुमान जी संजीवनी बूटी लेने आए थे, तब पहाड़ देवता साधना कर रहे थे। हनुमान जी ने इसके लिए अनुमति तक नहीं मांगी थी, ना ही उनकी साधना पूरी होने का इंतजार किया।

गावंवालों का कहना है कि हनुमान जी ने पहाड़ देवता की साधना भी भंग कर दी। इतना ही नहीं हनुमान जी ने द्रोणागिरी पर्वत ले जाते समय पहाड़ देवता की दाईं भुजा भी उखाड़ दी। मान्यता है कि आज भी पर्वत से लाल रंग का रक्त बह रहा है। यही कारण है कि द्रोणागिरी गांव के लोग हनुमानजी की पूजा नहीं करते और ना ही लाल रंग ध्वज लगाते हैं।

यहां के लोगों में नाराजगी इस कदर थी कि उन्होंने उस वृद्ध महिला का भी सामाजिक बहिष्कार कर दिया जिसकी मदद से हनुमानजी उस पहाड़ तक पहुंचे थे. लेकिन उस वृद्ध महिला कि गलती की सजा आजतक इस गांव की महिलाओं को भी भुगतना पड़ता है। यह पर्वत बद्रीनाथ धाम से करीब 45 किमी दूर स्थित है।  आज भी द्रोणगिरी पर्वत का ऊपरी हिस्सा कटा हुआ दिखाई देता है। 

चमोली जिले में जोशीमठ से मलारी की तरफ लगभग 50 किलोमीटर आगे बढ़ने पर जुम्मा नाम की एक जगह आती है। यहीं से द्रोणगिरी गांव के लिए पैदल मार्ग शुरू हो जाता है। यहां धौली गंगा नदी पर बने पुल के दूसरी तरफ सीधे खड़े पहाड़ों की जो श्रृंखला दिखाई देती है, उसे पार करने के बाद द्रोणगिरी पर्वत पहुंच सकते हैं। संकरी पहाड़ी पगडंडियों वाला तकरीबन दस किलोमीटर का यह पैदल रास्ता बहुत कठिन है।



 


 

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