Sat. Oct 23rd, 2021

ठगी की दुनिया का इकलौता शख्श नटवरलाल ,जिसने ताजमहल ,लालकिला और संसद भवन भी बेच दिया था

क़िस्से-कहानियों में कई ठगों के ठगी के अचंभित कर देने वाली कहानियाँ पन्नों में दर्ज है , लेकिन, ये किस्सा है, ठगी की दुनिया के एक ऐसे व्यक्ति का , जिसने ठगी करते हुए ताजमहल, लाल किला, राष्ट्रपति भवन और संसद भवन तक को कई बार सरकारी कर्मचारी बनकर बेच दिया था। ठगी का दुनिया का इकलौता नाम , ‘नटवर लाल’ जिसे भारत का सबसे बड़ा ठग कहा जाता है । 1912 में बिहार  के सीवान जिले के बंगरा गाँव में जन्मे नटवर लाल का वास्तविक नाम मिथलेश कुमार श्रीवास्तव था । वैसे इसने ठगी के धंधे में 50 से भी अधिक नकली नाम रखे  थे। कई बार पकड़ा भी गया लेकिन वहां भी ठगी कर देश की बड़ी-बड़ी जेलों से 8 बार भागने में कामयाब रहा ।

नटवरलाल पढ़ा लिखा था ,उसने वकालत की डिग्री ली थी । लेकिन अपने तेज दिमाग का इस्तेमाल उसने वकालत में न कर ,ठगी के धंधे में करना शुरू कर दिया । नटवर लाल ने ठगी करते हुए ताजमहल, लाल किला, राष्ट्रपति भवन और संसद भवन तक को कई बार सरकारी कर्मचारी बनकर बेच दिया था ।

एक ऐसा ठग जिसने ठगी के लिए राजीव गांधी से लेकर राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद के नाम तक का इस्तेमाल किया। 8 राज्यों में 100 से ज्यादा ठगी के मामलों में वांछित इस शख्स ने सत्तर, अस्सी और नब्बे के दशकों में एक के बाद एक कई ठगी की घटनाओं को अन्जाम दिया और नटवरलाल नाम भारत के सबसे कुख्यात ठग के रूप में प्रसिद्ध हो गया।अपने जीवनकाल में करोड़ों रुपए ठगने वाले नटवर का कहना था कि वह लोगों से झूठ बोलकर पैसे मांगता है और लोग उसे देते हैं, इसमें उसका क्या कसूर है?

नटवरलाल फर्जी हस्ताक्षर करने में माहिर था । एक नजर में वह किसी के भी हस्ताक्षर की नकल कर लेता था। नटवरलाल ने नकली चेक और डिमांड ड्राफ्ट देकर कई दुकानदारों से लाखों रुपए ठगे । वेश बदलने में माहिर नटवरलाल ने  एक बार राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद के फर्जी हस्ताक्षर कर भी ठगी की थी। इस शख्स ने धीरूभाई अम्बानी, टाटा , बिरला सहित कई  उद्योगपतियों के अलावा सरकारी अधिकारियों को भी अपनी ठगी का शिकार बनाया था।

बातों में फसाने का हुनर इतना जबरदस्त था कि नटवरलाल यदि किसी से 10 मिनट बात कर लेता तो वो शख्श वही करता जो नटवरलाल चाहता था।इस हुनर के कारण उसने कई बड़े व्यापारियों को चूना लगाया । यकीन करना मुश्किल है, लेकिन यह  सच है कि नटवरलाल ने कई मर्तबा ताज महल और लाल-किले को बेचा था, नटवरलाल ने बड़ा सरकारी अफसर बनकर विदेशियों को तीन बार ताजमहल, दो बार लालकिला, एक बार राष्ट्रपति भवन और एक बार संसद भवन तक बेच दिया था।

 

भारत के राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद के गाँव जीरादेई से दो किलोमीटर की दूरी पर नटवरलाल का गाँव था । एक बार जब डॉक्टर राजेन्द्र प्रसाद गाँव आए तो नटवरलाल को उनसे मिलने का मौका मिला । नटवरलाल ने उनके सामने भी अपने हुनर का प्रदर्शन करते हुए राष्ट्रपति के  हुबहू हस्ताक्षर करके सबको हैरान कर दिया । नटवरलाल ने राष्ट्रपति से कहा कि आप मुझे किसी भी देश में राजदूत बनाकर भेज दीजिए। भारत का सारा कर्ज़ उतार दूंगा। राजेंद्र बाबू ने कहा कि मैं जानता हूं, तुम ऐसा कर सकते हो, लेकिन इसके बाद कोई भारत को कर्ज़ नहीं देगा ।

एक बार अदालत में खड़े नटवरलाल को देख जज ने  सवाल किया , ‘तुम लोगों से पैसे कैसे ले लेते हो? कैसे बेवक़ूफ़ बना देते हो ?’ उसने हाथ जोड़कर कहा, ‘मैं किसी को बेवकूफ नहीं बनाता। लोग ख़ुद ही दे देते हैं। आपको भी बता दूंगा, लेकिन पहले एक सिगरेट दिला देंगे क्या?’ जज ने  सिगरेट का एक पैकेट और माचिस मंगवाकर दे दी। उस शख़्स ने फिर डिमांड की, ‘हुजूर, चार आने मिलेंगे ?’ जज को केस जल्दी से आगे बढ़ाना था। उनके पास 10 का नोट था, तो वही थमा दिया। रुपये लेते हुए उस शख़्स ने मुस्कुराते हुए कहा, ‘देख लीजिए साहब, मैंने आपसे कितने प्यार से केवल एक सिगरेट मांगी थी। आपने पूरा पैकेट दे दिया। साथ में माचिस भी। चार आने की जगह 10 रुपये दिए। ऐसा ही बाक़ी लोग भी करते हैं। इसमें मेरी क्या ग़लती?

कई राज्यों में सौ से अधिक मामलों में वह वॉन्टेड था। पुलिस ने कई दफ़ा पकड़ा,  कुल मिलाकर उसे करीब सवा सौ साल की जेल हुई थी, लेकिन वह सलाखों के पीछे रहा मुश्किल से 20 साल। नटवरलाल कभी व्यापारी बनता, कभी किसी राजनेता का ख़ास, तो कभी समाजसेवी मिथिलेश कुमार श्रीवास्तव , ठगी की दुनिया का यह नटवरलाल इतना मशहूर हो चुका था की इसके नाम से एक फ़िल्म भी बनी ।

नटवरलाल के गाँव मे प्रचलित किस्सों के अनुसार उसने अमीरों को ठगा और उस पैसों से ज़रूरतमंदों की मदद की, गांव में कई ग़रीब लड़कियों की शादी कराई। नटवरलाल खुद भी मानता था कि वह अपराध नहीं समाजसेवा करता है ।

एक बार ‘नटवरलाल को  सीवान की अदालत में पेश किया गया । जज ने पूछा कि इतनी सफ़ाई से दूसरों के हस्ताक्षर कैसे कर लेते हो ? नटवरलाल ने एक सादा काग़ज़ मंगाया और उसके बीच में जज से साइन करने को कहा। इसके बाद ऊपर और नीचे कई बार उस सिग्नेचर की नक़ल उतार दी। जब जज को दोबारा काग़ज़ दिया गया तो वह अपना साइन पहचान ही नहीं पाए। नटवरलाल के गाँव बंगरा के लोगों की नजर में नटवरलाल  एक बड़ी शख़्सियत थी , जिसने गलत दिशा चुन ली। देशभर में सैकड़ों नामचीन पढे लिखे लोगों को भी अपनी बुद्धि से ठग लेने वाला कोई साधारण इंसान थोड़े ही है ।बांगरा में आज मिथिलेश कुमार उर्फ नटवरलाल के परिवार का कोई नहीं बचा है।

नटवरलाल को अंतिम बार 1996 में गिरफ्तार किया गया था। तब उसकी उम्र 84 साल थी और उस समय भी इलाज के लिए कानपुर जेल से दिल्ली के एम्स ले जाने के दौरान नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर पुलिसकर्मियों को चकमा देकर वह फरार हो गया। इसके तरह वर्ष बाद 2009 में नटवरलाल के वकील ने कानपुर की एक अदालत में याचिका दायर कर कहा कि नटवरलाल की मौत हो चुकी है। उस पर दर्ज सारे मुकदमे ख़ारिज कर दिए जाने चाहिए ,लेकिन नटवरलाल के भाई गंगा प्रसाद के अनुसार  उनके भाई  की मौत 1996 में ही रांची में हो गई थी ,और उन्होंने ही अंतिम संस्कार किया था । सच क्या है, कोई नहीं जान पाया ।




News mandi desk


 

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