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बिहार के औरंगाबाद का प्राचीन देव सूर्य मंदिर , जिसके दरवाजे रातों रात पूर्व से पश्चिम दिशा की ओर हो गए थे

औरंगाबाद:  जिले का देव सूर्य मंदिर , जहाँ हर साल करीब15 लाख श्रद्धालु छठ व्रत के लिए आते हैं। देव के सूरजकुंड में पहला अर्घ्य देने के लिए घाट पर जनसैलाब उमड़ पड़ता है , प्रशासन इस अवसर पर स्थानीय लोगों व समितियों, की मदद से चौकस रहता है, जरा सी लापरवाही  हादसा बन सकती है । इस बार भी करीब 15 लाख श्रद्धालुओं ने डूबते हुए सूरज को अर्घ्य दिया । इस बार भी जिला प्रशासन की तैयारियों के लाख दावों के बाद भी श्रद्धालुओं की उमड़ी भारी भीड़ लापरवाही से अनियंत्रित हो गई ।जिसके बाद  मंदिर से देव सूरजकुंड जाने वाला रास्ता बिल्कुल बंद हो गया है । श्रद्धालु गिर पड़े , और भगदड़ में दो बच्चों की मौत हो गई।

आखिर क्यों लगती है इस मंदिर में इतनी भीड़ , आइये इस प्राचीन मंदिर के बारे में जानें । बिहार के औरंगाबाद जिले का देव सूर्य मंदिर सूर्योपासना के लिए सदियों से आस्था का केंद्र बना हुआ है ।आमतौर पर सूर्य मंदिर पूर्वाभिमुख (पूर्व की दिशा में खुलने वाले)  होतेे है, लेकिन इस मंदिर के पश्चिमाभिमुख (पश्चिम दिशा में खुलने वाले) होने के कारण विशेष महत्व रखता है । प्रति वर्ष चैत्र और कार्तिक माह में होने वाले छठ व्रत के लिए भी यहां लाखों श्रद्धालु पहुंचते हैं ।

अभूतपूर्व स्थापत्य कला वाले इस प्रसिद्ध मंदिर के बारे में मान्यता है कि इसका निर्माण भगवान विश्वकर्मा ने स्वयं अपने हाथों से किया था । काले और भूरे पत्थरों से निर्मित मंदिर की बनावट ओडिशा के पुरी स्थित जगन्नाथ मंदिर से मिलती-जुलती है । मंदिर के बाहर लगे एक शिलालेख के मुताबिक, 12 लाख 16 हजार साल पहले त्रेता युग बीत जाने के बाद इला पुत्र ऐल ने इस देव सूर्य मंदिर का निर्माण शुरू करवाया था , शिलालेख से पता चलता है कि इस पौराणिक मंदिर के निर्माण काल को एक लाख पचास हजार वर्ष से ज्यादा हो गया है ,  देव मंदिर में सात रथों से सूर्य की उत्कीर्ण प्रस्तर मूर्तियां अपने तीनों रूपों- उदयाचल, मध्याचल और अस्ताचल सूर्य के रूप में विद्यमान हैं। कहा जाता है कि पूरे भारत में सूर्यदेव का यही एक मंदिर है जो पूर्वाभिमुख न होकर पश्चिमाभिमुख है.

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किवदंतियों के अनुसार इस मंदिर का द्वार पहले पूर्व की दिशा की ओर ही था, लेकिन एक बार लुटेरों का एक दल देव सूर्य मंदिर को लूटने यहां पहुंचा था, तब पुजारियों ने इसकी महत्ता बताते हुए ऐसा करने से मना किया. तब लुटेरों ने कहा कि यदि तुम्हारे देवता में इतनी शक्ति है तो रात भर में इस मंदिर की दिशा पूर्व से पश्चिम हो जाए , अगर ऐसा हुआ तो इस मंदिर को नहीं लूटेंगे , अन्यथा मंदिर तोड़ देंगे । लुटेरे रातभर वहीं प्रतीक्षा करते रहे. रात में पुजारियों ने भगवान भास्कर से प्रार्थना की और सुबह जब यहां लोग पहुंचे, तो मंदिर का द्वार पश्चिम की ओर हो चुका था. यह चमत्कार देखकर लुटेरे दंग रह गए और वहां से भाग खड़े हुए.

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सर्वाधिक प्रचारित जनश्रुति के अनुसार, राजा ऐल श्वेतकुष्ठ रोग से पीड़ित थे. एक बार शिकार करने देव के वनप्रांतर में पहुंचने के बाद वह राह भटक गए. भूखे-प्यासे राजा को एक छोटा-सा सरोवर दिखाई पड़ा, जिसके किनारे वह पानी पीने गए और अंजलि में भरकर पानी पिया । पानी पीने के क्रम में वह यह देखकर घोर आश्चर्य में पड़ गए कि उनके शरीर के जिन हिस्सों पर पानी का स्पर्श हुआ, उन हिस्सों से श्वेतकुष्ठ के दाग चले गए. शरीर में आश्चर्यजनक परिवर्तन देख प्रसन्नचित राजा ऐल ने यहां एक मंदिर और सूर्यकुंड का निर्माण करवाया था.



न्यूजमंडी, सेंट्रल डेस्क:-



 

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