Sat. Jan 23rd, 2021

मौत के मुंह से भी खींच लाता है , महामृत्युंजय मंत्र

शास्त्रों और पुराणों में असाध्य रोगों से मुक्ति और अकाल मृत्यु से बचने के लिए महामृत्युंजय मंत्र के जप का विशेष उल्लेख  है। महामृत्युंजय भगवान शिव को प्रसन्न करने का मंत्र है। इसके प्रभाव से इंसान मौत के मुंह में जाते-जाते बच जाता है, मरणासन्न रोगी भी महाकाल शिव की अद्भुत कृपा से जीवन पा लेते है।

महामृत्युंजय मंत्र (“मृत्यु को जीतने वाला महान मंत्र”) जिसे त्रयंबकम मंत्र भी कहा जाता है, यजुर्वेद के रुद्र अध्याय में, यह भगवान शिव की स्तुति हेतु की गयी एक वन्दना है। इस मंत्र में शिव को ‘मृत्यु को जीतने वाला’ बताया गया है। यह गायत्री मंत्र के समकक्ष हिन्दू धर्म  का सबसे व्यापक रूप से जाना जाने वाला मंत्र है।

ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्‌। उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्‌॥

भगवान शिव की कृपा प्राप्त करने के लिए सबसे अधिक प्रभावशाली मंत्र माना जाता है- महामृत्युंजय मंत्र। यही वह मंत्र है, जो अकाल मृत्यु के भय और अपशकुन को टालने की क्षमता रखता है। इस मंत्र की रचना मार्कंडेय ऋषि ने की थी। इसका वर्णन ऋग्वेद में मिलता है। 

महामृत्युंजय मंत्र की रचना करनेवाले मार्कंडेय ऋषि तपस्वी ऋषि मृकंदु औऱ उनकी पत्नी मरूध्वति को कई वर्षों तक कोई संतान नहीं हुई थी। संतान सुख प्राप्त करने के लिए ऋषि मुकुंद और उनकी पत्नी ने भगवान शिव की कठिन तपस्या की। ऋषि मृकंदु औऱ उनकी पत्नी मरूध्वति ने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए आस्था और विश्वास के साथ कठिन तपस्या की। उनकी कठिन तपस्या से भगवान शिव प्रसन्न हुए उन्हें पुत्र रत्न का वरदान दिया। जब मार्कंडेय का शिशुकाल बीता और वह बोलने और समझने योग्य हुए तब उनके पिता ने उन्हें उनकी अल्पायु की बात बता दी। साथ ही शिवजी की पूजा का बीजमंत्र देते हुए कहा कि शिव ही तुम्हें मृत्यु के भय से मुक्त कर सकते हैं। तब बालक मार्कंडेय ने शिव मंदिर में बैठकर शिव साधना शुरू कर दी। जब मार्कंडेय की मृत्यु का दिन आया उस दिन उनके माता-पिता भी मंदिर में शिव साधना के लिए बैठ गए।

जब मार्कंडेय की मृत्यु की घड़ी आई तो यमराज के दूत उन्हें लेने आए। लेकिन मंत्र के प्रभाव के कारण वह बच्चे के पास जाने की हिम्मत नहीं जुटा पाए और मंदिर के बाहर से ही लौट गए। उन्होंने जाकर यमराज को सारी बात बता दी। इस पर यमराज स्वयं मार्कंडेय को लेने के लिए आए। यमराज की रक्तिम आंखें, भयानक रूप, भैंसे की सवारी और हाथ में पाश देखकर बालक मार्कंडेय डर गए और उन्होंने रोते हुए शिवलिंग का आलिंगन कर लिया।

जैसे ही मार्कंडेय ने शिवलिंग का आलिंगन किया स्वयं भगवान शिव प्रकट हुए और क्रोधित होते हुए यमराज से बोले कि मेरी शरण में बैठे भक्त को मृत्युदंड देने का विचार भी आपने कैसे किया? इस पर यमराज बोले- प्रभु मैं क्षमा चाहता हूं। विधाता ने कर्मों के आधार पर मृत्युदंड देने का कार्य मुझे सौंपा है, मैं तो बस अपना दायित्व निभाने आया हूं। इस पर शिव बोले मैंने इस बालक को अमरता का वरदान दिया है। शिव शंभू के मुख से ये वचन सुनकर यमराज ने उन्हें प्रणाम किया और क्षमा मांगकर वहां से चले गए। यह कथा मार्कंडेय पुराण में वर्णित है।

महामृत्युंजय मंत्र 

ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्

उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्

अर्थ- 

त्र्यंबकम् – तीन नेत्रोंवाले, यजामहे – जिनका हम हृदय से सम्मान करते हैं और पूजते हैं,  सुगंधिम -जो एक मीठी सुगंध के समान हैं, पुष्टिः – फलने फूलनेवाली स्थिति, वर्धनम् – जो पोषण करते हैं, बढ़ने की शक्ति देते हैं, उर्वारुकम् – ककड़ी, इव – जैसे, इस तरह
बंधनात् – बंधनों से मुक्त करनेवाले, मृत्योः = मृत्यु से
मुक्षीय = हमें स्वतंत्र करें, मुक्ति दें
‘ मा = न, अमृतात् = अमरता, मोक्ष

भावार्थ- हम भगवान शिवशंकर की पूजा करते हैं, जिनके तीन नेत्र हैं, जो संपूर्ण जगत का पालन पोषण अपनी कृपादृष्टि से कर रहे हैं। उनसे हमारी प्रार्थना है कि वह हमें मृत्यु के बंधनों से मुक्त कर दें। जिस प्रकार एक ककड़ी इस बेल रूपी संसार में पककर उसके बंधनों से मुक्त हो जाती है, उसी प्रकार हम भी इस संसार रूपी बेल में पक जाएं और आपके चरणों की अमृतधारा का पान करते हुए शरीर को त्यागकर आपमें लीन हो जाएं।

शिवपूजन में कई तरह के मंत्रों का जाप किया जाता है और कार्यसिद्धि के लिए इन मंत्रों की संख्या भी अलग होती है लेकिन शिव शंभू को उनका यह मंत्र बहुत ही प्रिय है।

महामृत्युंजय मंत्र का उल्लेख ऋग्वेद से लेकर यजुर्वेद तक में मिलता है। वहीं शिवपुराण सहित अन्य ग्रंथो में भी इसका महत्व बताया गया है। संस्कृत में महामृत्युंजय उस व्यक्ति को कहते हैं जो मृत्यु को जीतने वाला हो। इसलिए भगवान शिव की स्तुति के लिए महामृत्युंजय मंत्र का जप किया जाता है। इसके जप से संसार के सभी कष्ट से मुक्ति मिलती हैं। ये मंत्र जीवन देने वाला है। इससे जीवनी शक्ति तो बढ़ती ही है साथ ही सकारात्मकता बढ़ती है।

इस मंत्र का कितने बार करें जाप…

भय से मुक्ति के लिए 1100 बार मंत्र का जप किया जाता है.-रोगों से मुक्ति के लिए 11000 मंत्रों का जप किया जाता है.-पुत्र की प्राप्ति के लिए, उन्नति के लिए, अकाल मृत्यु से बचने के लिए सवा लाख की संख्या में मंत्र जप करना अनिवार्य है. – यदि साधक पूर्ण श्रद्धा और विश्वास के साथ यह साधना करें, तो वांछित फल की प्राप्ति की प्रबल संभावना रहती है।




Photo: internet


 

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