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रघुबर दास को भारी पड़ा ,सरयू राय को हल्के में लेना

झारखंड :- मुख्यमंत्री रघुबर दास को भारी पड़ा सरयू राय को हल्के मे लेना ।झारखंड की रघुबरदास सरकार में खाद्य एवं वितरण मंत्री का पद संभाल रहे सरयू राय को टिकट से बेदखल करना भाजपा को तो भाजपा को तो भारी पड़ा ही , मुख्यमंत्री रघुबर दास के लिए भी मुसीबत बन गया ।16 जुलाई 1951 में शाहबाद जिले के इटाही ब्लॉक में जन्मे सरयू राय मध्यम वर्ग परिवार से ताल्लुक रखते हैं. इनके पिता किसान हैं वहीं माता गृहणी हैं.  सरयू राय ने भौतिक शास्त्र में ग्रेजुएशन किया वहीं स्पैक्ट्रोस्कोपी में मास्टर्स डिग्री हासिल कर साल 1972 में अपनी पढ़ाई को पूरा किया । सरयू राय ,अपनी ईमानदार ,कर्तव्यनिष्ठ छवि से भ्रष्टाचार के खिलाफ प्रारम्भ से ही मुखर रहे हैं ।भाजपा के साथ बहुत लंबे समय तक रहकर ,इन्होंने पार्टी की जीत रणनीतियां भी बनाई और दलों में व्याप्त भ्रष्टाचार को भी उजागर किया ।बिहार में चारा घोटाला उजागर करने में इनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है ।सरयू राय का भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ने का रिकार्ड इतना जबर्दस्त है कि उनकी वजह से तीन-तीन मुख्यमंत्रियों को सलाखों के पीछे जाना पड़ा है। इन तीन मुख्यमंत्रियों में लालू यादव और जगन्नाथ मिश्र चारा घोटाले में और मधु कोड़ा 8000 करोड़ के घोटाले में जेल भेजे जा चुके हैं।  सरकार में रहकर भी सरयू राय ने हमेशा अपनी ही सरकार की गलत नीतियों का खुलकर विरोध किया ,यही कारण है कि मुख्यमंत्री रघुबर दास की आँखों का कांटा बने ,और पार्टी में गुटबाजी होने लगी । केंद्रीय नेतृत्व भी इनके ईमानदार रसूख को न पहचान पाया , टिकट नहीं मिला । सरयू राय अपनी पार्टी के इस कदम पर हैरान रह गए । निर्दलीय मैदान में कूद पड़े । गरीब गुरबों की आवाज उठाते ,सत्य ,न्याय और भ्रष्टाचार से निरंतर लड़ते सरयू राय को अन्य दलों ने भी सम्मान दिया ,समर्थन दिया और पाँच साल तक सरकार चलाने वाले रघुबर दास के राजनीतिक कैरियर को भी अस्थिर कर दिया ।

24 साल से लगातार जीत कर मुख्यमंत्री तक पहुंचने वाले रघुबर दास जमशेदपुर पूर्व से से अपनी ही पार्टी के सरयू राय से 15804 मतों से पराजित हो गए । यूँ तो सरयू राय जमशेदपुर पश्चिम से चुनाव लड़ते थे ,लेकिन इस बार टिकट कटने से आहत होकर इन्होंने जमशेदपुर पूर्व से रघुबर दास के खिलाफ बिगुल फूंका । सरयू राय साल 1962 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े और इमरजेंसी लागू होने के बाद पूरी तरह वो भाजपा में शामिल हो गए। बिहार में एमएलसी भी बने । बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से इनकी दोस्ती काफी पुरानी रही है ।पटना यूनिवर्सिटी में छात्र जीवन से ही दोनों नेे राजनीति में कदम रखा और आपातकाल के समय इंदिरा सरकार के खिलाफ मोर्चा खोला ।2009 में नीतीश कुमार ने इन्हें बिहार की राजनीति में आने का निमंत्रण दिया था लेकिन भाजपा के साथ अपनी प्रतिबद्धता के कारण इन्होंने मना कर दिया । लेकिन स्थितियां बदली और पार्टी के भ्रष्ट लोगों ने इनका टिकट कटवाया तो , सरयू राय निर्दलीय ही झारखण्ड में भाजपा को पटखनी देने उतर गए ।




न्यूज मंडी, सेंट्रल डेस्क:-



Image credit: google

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