पटना:  बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के करीबी माने जाने वाले मुंगेर से सांसद  ललन सिंह जेडीयू के नए राष्ट्रीय बने । मालूम हो कि बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के बेहद करीबी नेता आरसीपी सिंह के केंद्रीय मंत्री बनने के बाद से ही सूबे की सियासी गलियारों में ऐसी चर्चाएं थीं कि ललन सिंह को पार्टी की कमान सौंपी जा सकती है। ललन सिंह और नीतीश कुमार का राजनीतिक रिश्ता करीब तीन दशक पुराना है। कई बार ललन सिंह नीतीश कुमार से नाराज भी हुए , 2010 के  चुनाव से पहले ललन सिंह ने पार्टी छोड़ कर नीतीश से अपने विरोध को सरेआम जाहिर किया था । उस समय इन्होंने नीतीश कुमार के पेट में कहां-कहां दांत है वाला चर्चित बयान भी दिया था। हालांकि दो साल दूर रहने के बाद ललन लौटकर आ गए । राजनीतिक विश्लेषक मनतें हैं कि ललन सिंह को पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाना नीतीश कुमार की मजबूरी  थी। लेकिन इससे आने वाले समय मे जदयु को कोई फायदा नहीं होने वाला। आरसीपी सिंह को मंत्री बनाए जाने के बाद से ही  ललन खेमा नाराज था ।कहा जाता है कि जेडीयू को कुछ महीनों से आरसीपी सिंह ने हाईजैक कर लिया था। ललन सिंह जिनका मंत्री बनना तय लग रहा था लेकिन खबर बनी की उनका पत्ता आरसीपी सिंह ने काट दिया।  तब ललन सिंह की नाराजगी सार्वजनिक रूप से सामने आई. उन्होंने कई अहम बैठकों में आना बंद कर दिया. नीतीश पर ये बड़ा दबाव पड़ा। अब बात फायदे की करें तो तो ये  नीतीश की राजनीतिक मजबूरी थी कि सवर्ण समाज को राष्ट्रीय कमान सौंपी ।क्योंकि नीतीश कुमार ये बखूबी जानते हैं कि  पार्टी सिर्फ लव कुश यानी कुर्मी कोइरी से नहीं चलने वाली ।राज्य में कुर्मी 5 और कोइरी 6 फीसदी के आसपास हैं। कुर्मी का बड़ा वर्ग नीतीश को नेता मानता है लेकिन कोइरी का बड़ा वर्ग नीतीश को नेता नहीं मानता. कोइरी में आधार मजबूत करने की जरूरत नीतीश कुमार को विधानसभा चुनाव के बाद महसूस हुई तो उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी का विलय कराया। उमेश कुशवाहा को प्रदेश अध्यक्ष बनाया. पार्टी में दूसरी जाति के नेता और विरोधी पार्टी को कुर्मी कोइरी की पार्टी कहने लगे. ये एक दबाव सीएम नीतीश पर पहले से था।  लेकिन भूमिहार जाति से आने वाले ललन सिंह को राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाना पार्टी के लिए फायदे वाला सौदा नहीं होगा । ललन सिंह  जातिगत जमीनी पकड़ खो चुके हैं।ललन सिंह जिस भूमिहार बिरादरी से आते है वो भूमिहार 2013 से पीएम मोदी के लिए खड़ा है. बीजेपी का सबसे ताकतवर वोटर बन चुका है। फिर भी ये  नीतीश के रणनीतिकार माने जाते हैं।